तन, मन और मुक्ति —
बंधन का असली रहस्य
जब तक देह को 'मैं' मानते हैं, तब तक जन्म-मृत्यु का भय रहेगा
जब यह विज्ञान हो जाएगा कि तन और मन जहाँ नहीं — वहाँ कोई दुख नहीं, तो मुक्ति स्वयं मिल जाएगी।
— प्रवचन सारइस संसार में हम हर पल किसी न किसी चीज़ से सुखी होते हैं, किसी से दुखी होते हैं। कुछ चीज़ें पाकर प्रसन्न हो जाते हैं और कुछ को देखकर ही मन भारी हो जाता है। लेकिन क्या हमने कभी सोचा कि इस सुख-दुख का मूल कारण क्या है? यह प्रवचन उसी मूल रहस्य को उजागर करता है।
दिखाई देने वाली दुनिया और उसका बंधन
इस संसार में जो भी हमें दिखाई देता है — वह दो प्रकार का होता है। कुछ हमें प्रिय लगता है, कुछ अप्रिय। जो प्रिय लगता है, उसे हम बचाना चाहते हैं। जो अप्रिय लगता है, उसे दूर करना चाहते हैं। यही इच्छा ही बंधन है।
"दिखाई देने वाली चीज़ों से दिखाई देने वाले की ही हानि होती है।"
हमें अपना देह दिखाई पड़ता है। यह प्रिय लगता है, इसीलिए इसे नुकसान पहुँचाने वाले सांप से डर लगता है और इसकी रक्षा करने वाले डॉक्टर से प्रेम। यही है दृष्टि का बंधन।
बंधन क्या है? जो मिल गया, वो छोड़ना नहीं चाहते
जैसे राजनेता कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं होते, वैसे ही हम भी अपने देह, अपनों, धन और पद को छोड़ने को तैयार नहीं होते। हम जानते हैं कि यह सब एक दिन छूट जाएगा, फिर भी पकड़े रहते हैं।
देह से पहला रिश्ता बना, इसीलिए देह के ज़रिए परिवार, धन, घर — सब अपने लगने लगे। जिस दिन देह छूटी, सब छूट गया। देह ही वह पहला "विवाह" है जो हमने इस जन्म में किया।
देह से प्रेम क्यों? — एक गहरा प्रश्न
हम शरीर को बनाए रखना चाहते हैं क्योंकि हमें लगता है कि देह के रहने से हम जीवित हैं। पर यहीं पहली और सबसे बड़ी भ्रांति है।
यदि बिना देह के भी सुखी रहा जा सके और जीवित रहा जा सके — तो देह की क्या आवश्यकता? ठीक वैसे ही जैसे यदि बिना पत्नी या पति के सुखी हो सकते, तो कोई मूर्ख ही विवाह करता।
"शरीर से प्यार जीने के लिए है — और यही भ्रांति है। देह के अभाव में मृत्यु दिखती है, इसीलिए देह से मोह है।"
स्वार्थ और परोपकार — असली अंतर क्या है?
हम सब किसी न किसी स्वार्थ से बँधे हैं। किसान खेती करता है — अपनी भूख के लिए। नगर पालिका का कर्मचारी सफाई करता है — तनख़्वाह के लिए। प्रकृति में भी गिद्ध और सूअर जैसे प्राणी सफाई करते हैं — पर अपनी भूख मिटाने के लिए। फिर भी परमार्थ हो जाता है।
सच्चा परोपकारी वही है जो बिना किसी स्वार्थ के दूसरों के लिए जीए। जो कामनाओं से मुक्त हो — वही दूसरों को तार सकता है।
भोगी व्यक्ति सदा दीन और दरिद्र रहेगा — क्योंकि इच्छाएँ कभी समाप्त नहीं होतीं। योगी सदा देने को तैयार रहेगा — क्योंकि उसे किसी चीज़ की चाह नहीं।
तन नहीं, मन नहीं — तो दुख कहाँ?
गहरी नींद में न मन होता है, न तन से जुड़ाव। इसीलिए गहरी नींद में न सुख है, न दुख, न भय, न चिंता। यह एक सरल प्रमाण है कि दुख तन और मन से आता है — आत्मा से नहीं।
जन्म और मृत्यु देह का है — देह में आने से जन्म, देह छूटने से मृत्यु।
सुख और दुख मन का है — मन में आने से सुख-दुख, मन के शांत होने से शांति।
जहाँ मन नहीं, वहाँ संसार नहीं — ध्यान और समाधि में मन शांत होता है, इसीलिए वहाँ परम आनंद है।
तू न देह है, न मन — तू इन दोनों का साक्षी है। यह जानना ही मुक्ति है।
बुद्धि का सही उपयोग
अच्छी बुद्धि वह है जो तुम्हें देह का गुलाम नहीं बनाती, धन का गुलाम नहीं बनाती, पद का गुलाम नहीं बनाती — बल्कि राम का गुलाम बनाती है।
जब कोई भक्त यह जान लेता है कि "मुझे राम की सेवा करनी है" — तो वह शरीर के रहने या न रहने की परवाह नहीं करता। वह कहता है — "हे प्रभु! यदि तुम्हें काम कराना है तो शरीर दो, नहीं तो हम तैयार बैठे हैं।"
"जाही विधि राखे राम, ताही विधि रहिए — सीताराम!"
सत्संग में मन की एकाग्रता
जब सत्संग में आएँ तो केवल मोबाइल ही नहीं, मन का स्विच भी दुनिया से ऑफ़ करना चाहिए। क्योंकि जब तक मन संसार से जुड़ा है, सत्संग का रस नहीं मिलेगा। मन को यहाँ लाओ, तभी अमृत मिलेगा।

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